करवाचौथ वाया ब्यूटी-पार्लर
आखिर ऐसा क्यों है कि जो दर्जा पत्नी अपने पति को देती है पति नहीं देता? क्यों हर बार, हर पूजा, हर संस्कार और हर विश्वास पर केवल पत्नी को ही खरा उतरना होता है पति को नहीं? क्यों पत्नियां ही पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं पति नहीं? क्यों दहेज और अत्याचार की लाठी पत्नी ही खाती है पति नहीं? समाज में पत्नियों को ही बेचारी समझा जाता है पतियों को क्यों नहीं? क्यों नहीं पति एक दिन का निर्जल व्रत पत्नियों के लिए नहीं रखते?
अब कुछ समझदार-जानकार कहेंगे कि पति देवता होता है, इसलिए। पति को यह अधिकार है। पति का दर्जा पत्नी कभी ले ली नहीं सकती। पति पति ही होता है। औरत कभी भी पुरुष के बराबर खड़ी नहीं हो सकती। जी हां तर्क यही होंगे। या जो लोग तर्क पर यकीन नहीं करते; साफ कह देंगे कि हम जुबान लड़ाती या खोलती लड़की, पत्नी या औरत को 'कहीं का नहीं छोड़ते'। 'कहीं का नहीं छोड़ते' का मतलब आप समझते हैं न!
खैर...। मान लेती हूं कि जमाना बहुत तेजी से बदल रहा है। आधुनिकता की खुमारी का नशा आंगन से बिस्तर तक पहुंच गया है। जकड़ने टूटी हैं। टूट रही हैं। पर करवाचौथ पर पति की लंबी उम्र का ख्याल रखने और व्रत रहने वाली पत्नी से क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि क्या तुम्हारे पति भी तुम्हारी लंबी उम्र की कामना करते हैं? व्रत रहते हैं? पहला कोरा पत्नी के हाथ से ही खाते हैं? उनका उत्तर क्या होगा? यकीनन यही कि पति परमेश्वर है। पति अदालत है। आदि-इत्यादि।
अच्छा जो पत्नियां हर रोज पति की मार-कुटाई का शिकार बनती हैं या फिर जो उनके लिए सिर्फ 'इच्छा-पूर्ति' ही हैं, उनके लिए भी करवाचौथ पर पति देवता हो जाते हैं। बेशक इसे आप भारतीय संस्कार या परंपरा मानकर चुप रह लें, मगर मैं इसे सामंती संस्कारों का वहशी रूप मानती हूं। संस्कारों-परंपराओं की आड़ में अगर पत्नी मर या मार भी दी जाती है, तो यह भी सही है, क्योंकि यह पति की मर्जी है। दरअसल, हमारे यहां हर औरत की पराजय पुरुष की मर्जी के कारण ही होती है। जो इस पराजय से लोहा लेना चाहती हैं, वो समाज के लिए चरित्रवान पत्नियां नहीं होतीं। उन्हें पत्नी बनने का हक ही नहीं दिया जाना चाहिए।
करवाचौथ अब फैशन का बाजार है। जो पत्नी करवाचौथ पर ब्यूटी-पार्लर नहीं जाती। फैशन नहीं करती। अपने चेहरे को रंगती-पोतती नहीं। वो पतिव्रता या आधुनिक पत्नी हो ही नहीं सकती। बाजार ने उसे यह समझा-बता दिया है कि अगर अपने पति की लंबी-उम्र की कामना करना चाहती हो तो ब्यूटी-पार्लर जरूर जाओ। भले ही तुम्हारा सजना-संवरना रात ढलते-ढलते सुस्त पड़ता जाए पर पति के समक्ष सजी-संवरी गुड़िया ही बनी रहो। हां, यह आधुनिक करवाचौथ की हकीकत है।
मुझे नहीं मालूम कितने पति करवाचौथ की हकीकत और पत्नी के व्रत के संस्कार को समझते होंगे। शायद उनके लिए यह दिन भी रोजमर्रा के दिनों जैसा ही होगा। यह हमारे समाज की पुरुष-सत्ता है। जो अपनी मर्जी की मालिक है।
बाजार ने करवाचौथ को ब्यूटी पार्लर का संस्कार देकर और भी सामंती बना दिया है। क्या आपको नहीं लगता कि यह अपनी पति की लंबी उम्र की दुआ नहीं, अपनी 'ओढ़ी हुई सुंदरता' का दिखावा मात्र है। मगर जो बाजार की गिरफ्त में है, वो इसे क्या और क्यों समझेंगे?
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