Monday, October 5, 2009

करवाचौथ वाया ब्यूटी-पार्लर

आखिर ऐसा क्यों है कि जो दर्जा पत्नी अपने पति को देती है पति नहीं देता? क्यों हर बार, हर पूजा, हर संस्कार और हर विश्वास पर केवल पत्नी को ही खरा उतरना होता है पति को नहीं? क्यों पत्नियां ही पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं पति नहीं? क्यों दहेज और अत्याचार की लाठी पत्नी ही खाती है पति नहीं? समाज में पत्नियों को ही बेचारी समझा जाता है पतियों को क्यों नहीं? क्यों नहीं पति एक दिन का निर्जल व्रत पत्नियों के लिए नहीं रखते?

अब कुछ समझदार-जानकार कहेंगे कि पति देवता होता है, इसलिए। पति को यह अधिकार है। पति का दर्जा पत्नी कभी ले ली नहीं सकती। पति पति ही होता है। औरत कभी भी पुरुष के बराबर खड़ी नहीं हो सकती। जी हां तर्क यही होंगे। या जो लोग तर्क पर यकीन नहीं करते; साफ कह देंगे कि हम जुबान लड़ाती या खोलती लड़की, पत्नी या औरत को 'कहीं का नहीं छोड़ते'। 'कहीं का नहीं छोड़ते' का मतलब आप समझते हैं न!

खैर...। मान लेती हूं कि जमाना बहुत तेजी से बदल रहा है। आधुनिकता की खुमारी का नशा आंगन से बिस्तर तक पहुंच गया है। जकड़ने टूटी हैं। टूट रही हैं। पर करवाचौथ पर पति की लंबी उम्र का ख्याल रखने और व्रत रहने वाली पत्नी से क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि क्या तुम्हारे पति भी तुम्हारी लंबी उम्र की कामना करते हैं? व्रत रहते हैं? पहला कोरा पत्नी के हाथ से ही खाते हैं? उनका उत्तर क्या होगा? यकीनन यही कि पति परमेश्वर है। पति अदालत है। आदि-इत्यादि।

अच्छा जो पत्नियां हर रोज पति की मार-कुटाई का शिकार बनती हैं या फिर जो उनके लिए सिर्फ 'इच्छा-पूर्ति' ही हैं, उनके लिए भी करवाचौथ पर पति देवता हो जाते हैं। बेशक इसे आप भारतीय संस्कार या परंपरा मानकर चुप रह लें, मगर मैं इसे सामंती संस्कारों का वहशी रूप मानती हूं। संस्कारों-परंपराओं की आड़ में अगर पत्नी मर या मार भी दी जाती है, तो यह भी सही है, क्योंकि यह पति की मर्जी है। दरअसल, हमारे यहां हर औरत की पराजय पुरुष की मर्जी के कारण ही होती है। जो इस पराजय से लोहा लेना चाहती हैं, वो समाज के लिए चरित्रवान पत्नियां नहीं होतीं। उन्हें पत्नी बनने का हक ही नहीं दिया जाना चाहिए।

करवाचौथ अब फैशन का बाजार है। जो पत्नी करवाचौथ पर ब्यूटी-पार्लर नहीं जाती। फैशन नहीं करती। अपने चेहरे को रंगती-पोतती नहीं। वो पतिव्रता या आधुनिक पत्नी हो ही नहीं सकती। बाजार ने उसे यह समझा-बता दिया है कि अगर अपने पति की लंबी-उम्र की कामना करना चाहती हो तो ब्यूटी-पार्लर जरूर जाओ। भले ही तुम्हारा सजना-संवरना रात ढलते-ढलते सुस्त पड़ता जाए पर पति के समक्ष सजी-संवरी गुड़िया ही बनी रहो। हां, यह आधुनिक करवाचौथ की हकीकत है।

मुझे नहीं मालूम कितने पति करवाचौथ की हकीकत और पत्नी के व्रत के संस्कार को समझते होंगे। शायद उनके लिए यह दिन भी रोजमर्रा के दिनों जैसा ही होगा। यह हमारे समाज की पुरुष-सत्ता है। जो अपनी मर्जी की मालिक है।

बाजार ने करवाचौथ को ब्यूटी पार्लर का संस्कार देकर और भी सामंती बना दिया है। क्या आपको नहीं लगता कि यह अपनी पति की लंबी उम्र की दुआ नहीं, अपनी 'ओढ़ी हुई सुंदरता' का दिखावा मात्र है। मगर जो बाजार की गिरफ्त में है, वो इसे क्या और क्यों समझेंगे?

Thursday, October 1, 2009

गांधी याद हैं, लालबहादुर याद रहा तो याद कर लेंगे

आज दो अक्टूबर है। गांधी जयंती। गांधी के बहाने गांधी को याद करने का 'एक दिन'।
आज दो अक्टूबर है। लालबहादुर जयंती। लालबहादुर के बहाने लालबहादुर को न याद करने का 'हर दिन'।

हमें हर बार और हर कहीं सिर्फ गांधी ही याद रहते हैं। गांधी की बातें। गांधी का चरखा। गांधी के आदर्श। गांधी का गांधीवाद। गांधी हम पर सुरूर की तरह छाए हुए हैं। गांधी पर फिल्में बनती हैं। गांधी की आड़ में गांधीगीरी चलाई जाती है। हर सरकारी दफ्तर में गांधी की तस्वीर के नीचे गांधी की जबरदस्त धज्जियां उड़ाई जाती हैं। गजब देखिए। गांधी की कही बातों को अपनाने के लिए तो कहा जाता है। परंतु यहां कोई गांधी नहीं होना चाहता। जो तथाकथित गांधीवादी हैं, वे भी गांधी की सादगी में नहीं अपनी 'ओढ़ी हुई सादगी' में मस्त रहते हैं। न उनके हाथों में गांधी-डंड़ा होता है। न सिर पर गांधी-टोपी। न आंखों पर गांधी-चश्मा। न तन पर गांधी-वस्त्र। न व्यवहार में गांधी-चरखा। न शब्दों में गांधी-विचार।

मालूम है आपको गांधी होना या बनना किसी भी तरह के स्त्री-विमर्श से ज्यादा कठिन है।

हमें शुरू से यह बताया गया है कि यह गांधी (बापू) का देश है। यहां हर कोई गांधी बनने की तमन्ना रखता है। खासकर हमारे नेता खुद को गांधी से कम नहीं समझते! गांधी उनकी बपौती हैं। अब यह मेरी आंखों का मोतियाबिंद है या दिमागी लचारी कि मुझे यहां गांधी कहीं नजर नहीं आते। मैं तो गांधी को गांधी पार्क तक में जाकर खोज आई। पर गांधी नहीं मिले। सिवाय गंदी और धूलभरी प्रतिमा के। क्या गजब है कि हमने अपने महापुरूषों को प्रतिमाओं तक ही महदूद रख छोड़ा है। बेशक हमारे पास गांधी हैं, लेकिन प्रतिमाओं या तस्वीरों में। सिर्फ दो अक्टूबर के लिए। आयोजनों और जुबान-खर्ची के लिए।

दरअसल, हम महापुरूषों को अपनी सुविधाओं के हिसाब से याद करते हैं। हमें गांधी में तमाम सुविधाएं नजर आती हैं, मगर लालबहादुर में नहीं। लालबहादुर की सादगी का हमारे लिए कोई मतलब नहीं। आजकल नेताओं के बीच सादगी का जो दौर चल रहा है वो ज्यादा खास है। यहां हर खास की कीमत होती है। गांधी से हमें तमाम सुविधाएं मिलती रहती हैं, जो लालबहादुर से नहीं मिल पातीं। कमाल है कि यहां हर कोई गांधी तो बनना चाहता है, परंतु लालबहादुर नहीं। स्कूलों में भी बच्चों को गांधी का रट्टा लगवाया जाता है, लालबहादुर को कौन पूछता है? क्या लालबहादुर बनने के खतरे हैं? हां शायद उनकी ईमानदारी और सादगी के कारण!

गांधी की लाठी ताकतवर थी। लालबहादुर की ईमानदारी सशक्त। आज 21वीं सदी में दोनों ही हाशिए पर हैं। लाठी हथियार बन गई है। ईमानदारी बेईमानी। देश में नेता जरूर हैं, पर अपनी-अपनी सुविधाओं के लिए। हम तरक्की कर रहे हैं, पर गांव और खेतों को खत्म कर। किसान की आत्महत्या अब हमें परेशान नहीं करती। हां, मंत्री का सर दर्द तुरंत खबर बन जाता है।
यह गांधी, लालबहादुर और भगत सिंह का देश है। आज उनका आजाद कराया हुआ भारत देश अपनी आजादी पर रो रहा है। हमारी आजादी को लालफीताशाही की दीमक लगातार खोखला कर रही है। नहीं हमने नहीं बचाकर रखा है अपने महान क्रांतिकारियों और महापुरूषों के बलिदानों को। बस तरक्की की भेड़चाल में हर कोई यहां-वहां लगा हुआ है।

खैर...। गांधी हमने तुम्हारा ख्याल बस इतना रखा है कि तुम्हें नोटों पर सजा दिया है। और लालबहादुर हम तुम्हारा ध्यान इसलिए नहीं रख सके क्योंकि हमें गांधी की याद से फुर्सत ही नहीं मिली। हां अगर आज किसी को याद या ध्यान रहा तो तुम्हें (लालबहादुर) भी याद कर लिया जाएगा। वैसे इस देश में सब ठीक है। नेता मजे में है। भ्रष्टाचारी अर्थ-भक्ति में व्यस्त हैं। सुरक्षा-व्यवस्था चाक-चौबंद है।

तो गांधी और लालबहादुर अब तुम लोग आराम करो, हम अभी तुम्हारे गलों को सजाने आते हैं।

Tuesday, September 29, 2009

स्त्री-विमर्श के सहारे गोलाईयों-गहराईयों पर रस-चर्चा

हंस का नबंवर अंक स्त्री-विमर्श पर केंद्रित होगा। यानी एक और स्त्री-विमर्श। हंस में स्त्री-विमर्श पर वही प्रगतिशील लिखेंगे, जो बरसों से स्त्री-विमर्श की आड़ में उसकी गोलाईयों और गहराईयों का नाप-जोख ले रहे हैं। जिन्होंने स्त्री को शरीर से आगे बढ़कर न जाना है न पहचाना। इन सब महान स्त्री-विमर्श क्रांतिकारियों की फौज हंस के पन्नों पर स्त्री को बिखरते हुए देखेगी।

हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श पर बात बेहद ठसक के साथ की जाती है। विचारों को इस तरह से रखा जाता है कि अभी कुछ पलों में ही भारतीय स्त्री की दिशा और दशा बदलने वाली है। खुद राजेंद्र यादव ने अपने लेखों में स्त्री-विमर्श के बहाने स्त्री को आपकी कलम की नोक से कई दफा और कई जगह छूआ है। उन्हें कपड़ों में बंद नहीं, खासकर, ऊपर और नीचे से खुली स्त्री ही चाहिए; प्रगतिशील स्त्री-विमर्श के लिए। प्रगतिशीलों की निगाह में स्त्री सिर्फ दो ही जगहों से खूबसूरत हो सकती है। स्त्री हमारे मार्क्सवादी प्रगतिशीलों के लिए हर वक्त चूसे जाने वाला रस है।
कमाल देखिए, यह स्त्री-विमर्श कभी काली-कलूटी और कुरूप स्त्री पर नहीं किया जाता। स्त्री-विमर्श के लिए हमेशा सुंदर और कसावट वाली स्त्री ही चाहिए। गर्म स्त्री चाहिए।

अक्सर मैं सोचती हूं, जब अपने यहां स्त्री-विमर्श के इतने हितैषी और कद्रदान हैं, बावजूद इसके स्त्रियों की पारिवारिक और सामाजिक स्थिति में सुधार क्यों नहीं आ पा रहा? स्त्री को आज भी मारा और जलाया जा रहा है। क्या मरने और जलने वाली स्त्री अगर शरीर ढकना छोड़ दे, तो उसकी दिशा और दशा में बदलाव संभव है? प्रगतिशीलों कृपया उत्तर दें।

हंस के पिछले स्त्री-विमर्श पर लार टपकाते अंक मैंने देखे-पढ़े हैं; पर वहां निम्न वर्ग की स्त्री तो है ही नहीं। पढ़े-लिखे प्रगतिशीलों ने तमाम विदेशों लेखों के कथनों को अपने लेखों में भरकर यह जताने का प्रयास किया है कि देखो तुम से कहीं ज्यादा इस मुद्दे पर तो हमने पढ़ रखा है! भारत की गरीब और गांवों में बसने वाली स्त्रियों के पास उन जैसा उन्मुक्त स्त्री-विमर्श है ही नहीं।

यह कहने या लिखने में मुझे कोई अफसोस नहीं कि हंस-टाइप्ड स्त्री-विमर्श स्त्रियों को निरंतर धोखा दे रहा है। हम बाजार और विज्ञापनों के तो तुरंत खिलाफ हो जाते हैं, मगर ऐसे बेहूदा विमर्शों पर कभी कुछ नहीं कहते-बोलते। शायद साहित्य के सूरमाओं से डरते हैं!

मेरे लिए स्त्री का दूसरा नाम संघर्ष है। परंतु वो संघर्षशील स्त्री कभी भी स्त्री-विमर्श के बहस या अंक का माध्यम नहीं बन पाती। पुरुष बेमतलब के स्त्री-विमर्श तो कर-करवा सकता है, लेकिन स्त्रियों के संघर्ष में साथ आकर कभी खड़ा नहीं हो सकता। खुद राजेंद्र यादव बताएं कि वह कितनी दफा अपनी पत्नी के संघर्ष में साथ आकर खड़े हुए हैं? एक राजेंद्र यादव ही क्या; यहां ऐसे कितने मार्क्सवादी प्रगतिशील लेखक हैं, जिन्होंने स्त्री को कभी शरीर से आगे देखने-समझने की कोशिश की है।

अब तक स्त्री-विमर्श पर चलने वाली समस्त बहसें उसके ऊपर-नीचे के पते-ठिकानों से आगे नहीं बढ़ पाई हैं। पागल बनाते हैं वो जो स्त्री-विमर्श को स्त्री की प्रगतिशीलता से जोड़कर देखते हैं। जरा बताएं ये हंसवादी प्रगतिशील अब तक स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में क्या-क्या ठोस कर चुके हैं? कितनों ने अब तक स्त्री को सामाजिक और पारिवारिक गुंडागर्दी से बचाया है? यहां तो सब के सब पन्नों पर और भाषणों में क्रांति करते रहते हैं। स्त्री के वास्तविक दर्द ये वाकिफ ही नहीं।

यह स्त्री-विमर्श 'खोखला ढकोसला' है। हमें ऐसे स्त्री-विमर्श की कोई जरूरत नहीं, जो उसके त्याग और संघर्ष पर नहीं; उसकी गोलाईयों-गहराईयों पर केंद्रित हो।

Friday, April 24, 2009

राजनीतिक महिलाएं कहां आम महिलाओं के विषय में सोचती हैं

यह विद्रूप ही है कि संसद से सड़क तक महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण की मांग करने वाली हमारी तथाकथित राजनीतिक नेत्रियां कभी यह नहीं कहतीं कि सक्रिय राजनीति में भी महिलाओं का प्रतिशत बढ़ना चाहिए। उन्हें 33 फीसद आरक्षण की तो चिंता सताती है, परंतु सक्रिय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के प्रश्न पर वे मौन रहना ही पसंद करती हैं। शायद उनकी मौन पसंद में उनकी वास्तविक पसंद निहित हो! राजनीति में कौन चाहता है अपनी मलाई को दूसरे से शेयर करना।
आज राजनीति में जितनी भी महिलाएं सक्रिय हैं उनका अपना न कोई आधार है न अधिकार। उनके अधिकार और आधार पुरुष की स्वीकृति के गुलाम हैं। निज की स्वतंत्रता उन्हें कहीं नहीं है। वे सीना तानकर कहीं भी यह कह सकने की स्थिति में नहीं हैं कि हां यह मेरा अधिकार क्षेत्र है। मैं इसकी मालकिन हूं। मैं जानती हूं अब आप दो नाम अवश्य ही लेंगे; सोनिया गांधी और मायावती का। कुछ तो यह भी कह देंगे कि इन दोनों महिलाओं का अपना-अपना अधिकार क्षेत्र है। उसकी मालकिन भी ये ही हैं। अगर इस खुशफहमी को सत्य मान भी लिया जाए तो भी इसका कोई आधार नहीं होगा। सत्ता की जमीन पर सिर्फ दो ही महिलाओं के मजबूत पांव समस्त स्त्री-वर्ग की खुशहाली और मजबूती के लिए नाकाफी हैं। न ही इसे पूरी स्त्री-जाति की सबलता का वाइज ही ठहराया जा सकता है। उन्होंने अपने पांव तो मजबूत कर लिए मगर उन आम महिलाओं के विषय में कभी कुछ नहीं सोचा जो न सिर्फ सामाजिक बल्कि आर्थिक रूप से भी बेहद पिछड़ी हुई हैं। उनके पास अपनी कोई ताकत या जमीन नहीं है। महिलाएं ही महिलाओं की गुलाम हैं। सत्ता का मोह किसे अपने पाश में नहीं ले लेता!
साथ ही एक विद्रूप यह भी है कि चुनावों में महिलाओं का शोषण उनके प्रति हिंसा कभी कहीं कोई मुद्दा नहीं बनती। इसे मुद्दे को वे महिला सांसद तक उठाना पसंद नहीं करतीं जो स्वयं इस त्रासदी से अच्छे से बावस्ता हैं। उन्हें भी और मंत्रियों की तरह या तो मंदिर-मस्जिद बनवाने की जल्दी है या फिर काले धन को भारत वापस लाने की। जबकि मेरी निगाह में ये दोनों ही मुद्दे गैर-जरूरी और बोगस हैं। न मंदिर-मस्जिद महिलाओं के शोषण को रोक पाएंगे न काला धन स्त्री-धन की रक्षा कर पाएगा।
दरअसल, हमारी सरकारें पुरुषवादी सोच से ग्रस्त हैं। उन्हें नहीं लगता कि महिलाओं का भी स्तर बेहतर होना चाहिए और दैहिक-शोषण से उन्हें मुक्ति मिलनी चाहिए। यह हमारी कोरी खुशफहमी ही है कि हम कुछ प्रतिशत शहरी महिलाओं के शैक्षिक-सामाजिक स्तर को देखकर ही यह अनुमान लगा लेते हैं कि अन्य महिलाओं के भी शैक्षिक-सामाजिक स्तर में सुधार आ रहा है। वे जागरूक बन रही हैं। मगर यह कम से कम मेरी निगाह में पूरा सच तो नहीं है। गांव-कस्बों की महिलाएं तो आज भी अपने अस्तित्व से जूझ रही हैं। उनकी शिक्षा की तो छोड़िए उनका सामाजिक परिवेश भी गुलामों जैसा ही है। वे पुरुष वर्चस्व के हाथों हर रोज शोषित होने को मजबूर हैं। मगर अफसोस हमारी सरकारों नेताओं और महिला-नेत्रियों का ध्यान यहां कभी नहीं जाता। केवल तभी जाता है जब उन्हें उनके वोट चाहिए होते हैं। यानी सारी कवायदें महज वोट बटोरने तक ही सीमित हैं।

Thursday, April 23, 2009

विज्ञापित होती स्त्री और पेट में उठने वाला दर्द

वो अखबार वो चैनल ही क्या जिसमें विज्ञापित होती स्त्री न दिखती या दिखाई जाती हो। अखबार का पेट और चैनल की टीआरपी स्त्री की विज्ञापित होती छवि के बिना नहीं भर सकते। यह उनके लिए जरूरी है। शायद खुराक है उनकी।
मौसम में तब्दीली से लेकर नए उत्पाद के बाजार में आने तक सभी में स्त्री को पेश किया जाता है। अखबार मौसम के बढ़ते पारे में सर और मुंह छिपाती लड़की की तस्वीरों को ही छापना पसंद करते हैं। सर्द मौसम में भी उनका यही हाल रहता है। ऐसा लगता है, मानो इस धरती पर सबसे ज्यादा गर्मी और सर्दी स्त्री को ही लगती है!
अब विज्ञापनों को दोष देने वाले तर्क देते हैं कि स्त्री सरे बाजार अपने शरीर को दिखा रही है। खुलेआम और खुलकर विज्ञापित हो रही है। स्त्री को शर्म नहीं आती। शायद सारी शर्म-ओ-हया का ठेका अकेली स्त्री ने ही ले रखा है यहां!
खैर, स्त्री तो बेशर्म हो ही गई है। मगर जो शर्मसार और शर्म के रखवाले हैं उनकी शर्म कहां है? जब वे स्वयं स्त्री का शोषण करते पकड़े जाते हैं, उसे सरेआम खुलकर छेड़ते हैं, तब वे शर्मसार नहीं होते? तब उनकी कथित शर्म कहां चली जाती है? चाहते हैं कि स्त्री हर चीज केवल उन्हीं की आंखों से देखे। यानी स्त्री उनकी आंखों की गुलाम हो-बनकर ही रहे। वाह! आंखों वालो वाह!
कितना बेशर्म ख्याल है कि विज्ञापित होती स्त्री अपनी संस्कृति-सभ्यता को नष्ट कर रही है। यानी हर गलत और बुरा सिर्फ स्त्री ही करती है। बाकी हमारा सारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है! जितना और जहां तक गरियाना हो जमकर स्त्री को ही गरियाओ क्योंकि वो न कुछ कहेगी न बोलेगी। हर किसी को हर वक्त हर उम्मीद बस स्त्री से ही है।
आप अंडरबियर पहनकर विज्ञापित हो सकते हैं, लेकिन स्त्री के सीने पर से अगर जरा-सा पल्ला भी सरक जाए तो यहां 'सांस्कृतिक कोहराम' मच जाता है। वैसे हमें सब पाठ समानता का पढ़ाते हैं, मगर बात जब स्त्री की समानता से आकर जुड़ती है, सब अपनी-अपनी बगलों की बदबूओं पर खुशबूदार डियो डालकर बास दूर करने का प्रयास करते हैं। क्या लाजवाब और लजीज अक्ल पाई है उन्होंने!
अगर कल को कोई स्त्री पूछने लगे कि क्या अधिकार है अखबारों को चलती-फिरती लड़कियों की तस्वीरों को छापने का? किसने दिया है उन्हें यह हक? तब 'नैतिक उत्तर' किसी के पास नहीं होगा, सिवाय इसके कि यह तो हमारा काम है। जनाब जब यह आपका काम है तो फिर अपनी मर्जी से विज्ञापित होती स्त्री को टोकने वाले आप होते कौन हैं? उसकी मर्जी वो चाहे कुछ भी पहने या कैसे भी विज्ञापित हो। बेहतर हो आप अपने पेट के दर्द को काबू में रखें।
जरा कभी कोई असरदार मुहिम चलाएं उन अखबारों और चेनलों के खिलाफ जो स्त्री को जबरन विज्ञापित करते रहते हैं।

Monday, March 16, 2009

यह महिला क्रिकेट है, मेरी जान

महिलाओं को क्रिकेट खेलते देखना 'किसी रोमांच' से कम नहीं। इस रोमांचक एहसास को मैंने महसूस किया विगत शनिवार को हुए आईसीसी महिला विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट के तहत खेले गए, भारत-आस्ट्रेलिया मुकाबले में। क्या जबरदस्त मुकाबला था दोनों टीमों के बीच। बस, सबकुछ छोड़कर इसे ही देखते रहो। इस मुकाबले का रोमांच तब और भी बढ़ गया था, जब मैं मैदान पर महिला खिलाड़ियों को क्रिकेट खेलता देख रही थी। अब तक हम क्रिकेट को पुरुषों का खेल ही समझते-मानते चले आए हैं, परंतु आईसीसी महिला विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट को देखकर कहना पड़ रहा है कि क्रिकेट महिलाएं भी खेल सकती हैं। यानी यह महिला क्रिकेट है, मेरी जान।
भारत-आस्ट्रेलिया मुकाबले में भारत ने विश्व चैंपियन आस्ट्रेलिया को जबरदस्त शिकस्त दी। उन्होंने न सिर्फ यह मैच ही जीता बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से हमें बता यह भी दिया कि महिलाएं क्रिकेट में भी पुरुषों से कम नहीं। जब पुरुष क्रिकेट खिलाड़ी विश्व चैपियन आस्ट्रेलिया को हरा सकते हैं, तो ऐसा ही कमाल करने की हिम्मत महिलाएं भी रखती हैं। और उन्होंने यह कर भी दिखाया। इस मैच में अनघा देशपांडे (45 रन) अंजुम चोपड़ा (76 रन) और मिताली राज (44 रन) की बल्लेबाजी देखने लायक थी। गेंदबाजी में महिलाओं ने कोई कोर कसर बाकी नहीं रख छोड़ी थी। हां, आस्ट्रेलिया ने भी मुकाबला करने की जी-तोड़ कोशिश की परंतु वो सफल नहीं हो पाई। और आखिर में उसे हार की मुंह देखना ही पड़ा। इसे महज विड़बना ही कहा जाएगा कि उसी दिन भारत को न्यूजीलैंड ने करारी शिकस्त देकर उसकी हेकड़ी दुरुस्त की थी। शायद पुरुष क्रिकेटर खुद को क्रिकेट का बादशाह मानने की भूल कर बैठे थे।
एक अफसोस जरूर रहा कि भारत की आस्ट्रेलिया पर शानदार जीत को किसी मीडिया ने महज रूटीन खबर से ज्यादा जरूर नहीं समझा। शायद ऐसा क्रिकेट में महिलाओं की भागीदारी को लेकर था। वही स्त्री-पुरुष मानसिकता। मीडिया या अन्य किसी तथाकथित क्रिकेट विश्लेषक को या तो महिलाओं की क्रिकेट में जीत बरदाशत नहीं हुई या फिर उन्होंने इसे खारिज करना ही उचित समझा। खुद को बड़ा और महान क्रिकेट-प्रेमी मानने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने भी अपने अखबार जनसत्ता में इस मुद्दे पर कुछ नहीं लिखा। भला वह क्यों कुछ लिखने लगे, क्योंकि उनके साथ भी पुरुष-मानसिकता ही काम कर रही है न!
मैं तो कहती हूं, आईसीसी महिला विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट में जितनी भी टीमें खेलने आई हैं, यह महिला क्रिकेट के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं। महिलाएं हर उस क्षेत्र में अपनी भागीदारी अपनी पहुंच को बढ़ा रही हैं, जहां अब तक हम सिर्फ पुरुषों का वर्चस्व ही देखते चले-सुनते आए हैं। क्रिकेट उन्हीं में से एक खेल है। और देशों का तो नहीं मालूम मगर अपने देश में हममें से बहुतों की मानसिकता यही है कि क्रिकेट सिर्फ पुरुषों का ही खेल है और उन्हीं के लिए बना है, इसे महिलाएं क्या खाकर खेलेंगी! हमने दायरे बना दिए हैं कि यह तुम्हारी राह है, यह हमारी। लेकिन मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि महिलाएं निरंतर उन सीमित दायरों को तोड़-फोड़ रही हैं। वर्जनाओं को ध्वस्त कर रही हैं।
अच्छा मैं आपसे पूछती हूं कि आपमें से ऐसे कितने रहे होंगे जिन्होंने महिला क्रिकेट के इन रोमांचक मुकाबलों को देखा होगा? बहुतों को शायद यह बात मालूम भी न होगी कि कहीं किसी देश में महिला विश्व कप क्रिकेट मुकाबला भी चल रहा है। वैसे अगर उन्हें यह नहीं मालूम है, तो मालूम करें और पुरुषों की भांति हमारे देश की महिला क्रिकेट खिलाड़ियों की हौसला-अफजाई भी करें। क्योंकि उन्हें भी हमारे प्यार और उत्साह की उतनी ही जरूरत है, जितना कि हम अक्सर पुरुष क्रिकेट खिलाड़ियों को देते रहते हैं।
आईसीसी मुकाबले में चल रहे महिला क्रिकेटरों के खेल को देखते हुए मैं यह बात दावे के साथ कह सकती हूं कि हमारी महिला क्रिकेट खिलाड़ी और बेहतर खेल सकती हैं। बल्कि मैं तो इससे भी आगे जाकर यह कहना चाहती हूं कि हमें प्रत्येक उस महिला खिलाड़ी का उत्साहवर्द्धन करना चाहिए जो अपनी मेहनत और लगन के साथ खेल के मुकाबले में डटी हुई है। पीटी उषा, सानिया मिर्जा, सुमंगला, मिताली राज, पी शैलजा, रेनू वाला, यामिनी जैसी न जाने कितनी और महिलाएं खिलाड़ी हैं, जो निरंतर खेल रही हैं और देश के साथ-साथ स्त्री जाति को भी तमाम ऊचाईंयों पर लेकर जा रही हैं। ये सभी सम्मान के काबिल हैं।

Sunday, March 8, 2009

महिला दिवस एक संकीर्ण अवधारणा

मैंने महिला दिवस को कभी कोई 'तरजीह' नहीं दी। महिला दिवस कभी मुझे इस काबिल लगे ही नहीं कि जहां मुझे आम महिला की प्रसांगिकता नजर आती हो या आई हो। मेरा मानना है कि महिला दिवस आम महिलाओं के लिए नहीं, चंद खाई-पी-आघाई ऐलिट महिलाओं के लिए होते हैं। यहां आम संघर्षरत महिला कहीं नजर नहीं आती सिर्फ वही नजर आती हैं, जिनका एक विशेष वर्ग और गुट में खास रूतबा होता है। वे समाज का 'रोल मॉडल' होती हैं। महिला दिवस पर अखबारों में लंबी-लंबी खबरें और रपटें सिर्फ ऐलिट महिलाओं पर ही छपती हैं। अखबारों और मीडिया के पास चंद ऐलिट महिलाएं ही हैं, जिन्हें वे हर बार किसी न किसी बहाने महिला दिवस की 'महान नेत्रियां' बनाकर हमारे सामने खड़ा कर देते हैं। उन पर छपने वाले फीचर किसी महान लफ्फबाजी से कम नहीं होते।
अरे, हम क्या करें अगर वे ऐलिट महिलाएं कुछ संघर्ष करके एक ऊंचे मुकाम तक पहुंची हैं, तो क्या इसके आगे उनसे इतर महिलाओं का संघर्ष सिर्फ कहानी ही बनकर रह जाएगा? घर में झाड़ू-पोंछा करती महिला, पत्थर तोड़ती महिला, रेता-गारा उठाती महिला, फल-सब्जी बेचती महिला, घर-घर जाकर बर्तन धोती महिला क्या कथित महिला दिवसों की श्रेणी में आतीं हैं? आखिर क्यों कभी महिला दिवस पर ऐसी महिलाओं पर बात नहीं होती? क्यों उनके कठिन जीवन-संघर्ष को समाज के सामने नहीं लाया जाता? क्या महिला दिवस पर चंद ऐलिट महिलाओं का महंगे क्रीम-पाउडर लगाकर, ग्लैमरस कपड़े पहनकर इस या उस शो में हिस्सेदारी करना ही उनकी सामाजिक प्रगतिशीलता है? क्या वे यह सब दिखाकर उन निम्न महिलाओं को बताना चाहती हैं कि वे ऐसे दिवसों के लिए कितना खास हैं?
महिलाओं को सिर्फ एक दिन के लिए खास बना देने के मैं खिलाफ हूं। महिला हर दिन, हर पल और हर स्थिति के लिए खास ही नहीं 'जरूरी' भी है।
जरा मुझे यह तो बताइए कि आखिर इस एक दिन में वो अपने किस अधिकार को पा लेती है? कितनी हैसियत उसकी पुरुषसत्ता के खिलाफ बढ़ जाती है? क्या इस एक खास दिन पर उस पर होने वाले अत्याचार थम जाते हैं? क्या इस दिन उसका कहीं कोई शोषण नहीं होता? क्या उसे मादा-भ्रूण समझकर मार नहीं डाला जाता? क्या उसे देहज न ला पाने की कीमत नहीं चुकानी पड़ती? क्या वो समाज में खुद को स्वतंत्र महसूस कर पाती है? नहीं, जनाब नहीं, इसमें से कुछ भी उसके साथ नहीं होता। वो केवल दिवसों में ही खास बनी रहती है, हकीकत में नहीं। उसकी हकीकत इससे बिल्कुल जुदा होती है।
मेरे लिए किन्हीं संकीर्ण महिला दिवसों से कहीं ज्यादा जरूरी है, हर दिन हर पल हर महिला की सामाजिक, व्यक्तिगत, वैचारिक, शारीरिक और पारिवारिक स्वतंत्रता। महिला दिवसों में नहीं 'एक संगठन' में नजर आए। हर शारीरिक और मानसिक शोषण का प्रतिकार उसकी प्राथमिकता बने। बरसों से उसके चेहरों पर पड़ा लंबा घूंघट और सामंती बुर्का हटे। वो पित्तृसत्तामतकता की दास्ता को खारिज कर अपने शर्तों पर जिए और रहे। आज हम समय के साथ-साथ जैसे-जैसे बदलते जा रहे हैं, लगभग उसी तदाद में हम महिलाओं और बेटियों के प्रति वहशी भी बनते जा रहे हैं। हमें बेटियां आज भी नापसंद हैं। हम उन्हें जन्म लेने से पहले मार डालने की तमन्ना रखते हैं।
कैसी विडंबना है, एक तरफ हम आज महिला दिवस को सैलिब्रेट कर रहे हैं, दूसरी तरफ हमारे ही बीच से किसी महिला बेटी बहू को दहेज के लिए जलाया जा रहा है, उसका यौन शोषण किया जा रहा है, उसे भरे बाजार छेड़ा जा रहा है। यह सब अब खत्म होना चाहिए। और इस उद्दंडता का प्रतिकार सिर्फ औरत ही कर सकती है। पुरुषों से कहां कोई उम्मीद है हमें!
तो मेरी गुजारिश है कि हम महिला दिवस को कथित महिलों के महिमामंडन तक सीमित न कर उन आम महिलाओं का पहले नोटिस लें जो वाकई संघर्ष का माआदा रख हर जिम्मेदारी को बेहद हौसले के साथ संभाल रही हैं। कृपया, महिला दिवस को संकीर्ण अवधारणा बनाने से बचाएं।

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