रुचिका हमारे समय, हमारे समाज की भीषण त्रासदियों में से एक है। एक ऐसी त्रासदी जिस पर दंभी पुरुष हंसता है। उसकी हंसी में पुरुष वर्चस्व का दंभ साफ देखा जा सकता है। वो हंसता है रुचिका पर। वो हंसता है अरुषि पर। वो हंसता है जेसिका-मट्टू पर। वो हंसता है मुझ पर। वो हंसता है समस्त स्त्री जात पर। स्त्रियों के बदन को नोंचकर खाना उसकी आदत है। उस हंसनेवाले पुरुष के लिए स्त्री या बच्ची की इज्जत और उसके बाद की गई हत्या या आत्महत्या कोई मायने नहीं रखती। उसे तो बस हंसना है। हंसकर बताना है कि देखो औरत! तुम्हारी औकत मेरी जिंदगी में क्या है। चूंकि मैं पुरुष हूं इसलिए तुम्हें मारने और तुम्हारी मौत पर हंसने का अधिकार मुझे पुराणों ने दिया है।
हां, ठीक ऐसे ही हंसा जाता है हर स्त्री के शील पर। हां, ऐसे ही हंसा जाता है उसके बदन से उसके कपड़ों को नोंचने पर। क्योंकि तुम पुरुष हो इसलिए हम पर हंस सकते हो। एक हम हैं जो तुम्हारी हंसी पर सिर्फ मातम ही मना सकते हैं। तुम्हें मालूम है कि मातम हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक हम मातमों में ही तो जीती रही हैं। क्या हुआ जो रुचिका या अरूषि को किसी हैवान ने अपना शिकार बनाकर हमें मातम मनाने के लिए छोड़ दिया। उत्तर-आधुनिक समाज में स्त्री के जीने-मरने पर मातम आज भी बनाए जाते हैं।
क्या उम्र थी रुचिका की मात्र 14 साल। 14 साल की उम्र में उसके साथ...। कैसे कहें और क्यों मान लें कि 21वीं सदी में महिलाएं सुरक्षित हैं। वे प्रगति कर रही हैं। रात के बारहा या दो बजे हर कहीं आ जा सकती हैं। अगर वाकई ऐसा है तो क्यों रुचिका को आत्महत्या करनी पड़ती हैं और अरूषि को मार डाला जाता है। क्यों औरत को सड़क पर अकेला देख उसके जिस्म को नोंचकर खाया जाता है। यह वो समाज है जिस पर हम गर्व करने का कोई मौका नहीं जाने देते। लेकिन यह गर्व तब बहुत वहशी हो जाता है जब औरत को अकेला या असहाय देखता है।
इस वक्त रुचिका पर ठीक वैसी ही बहस चल रही है जैसी पिछले दिनों अरूषि पर चली थी। तर्कों के बाजार में हर कोई अपने-अपने तर्क लिए खड़ा है। बुद्धिजीवि बुद्धि की क्रांति करने पर तुले हैं। लेखक कलम तोड़ रहे हैं। रही बात नारीवादी संगठनों की तो वे अभी इतने मजबूत नहीं हो पाए हैं कि पुरुष वर्चस्व की हथकड़ियों को तोड़ सकें।
अरे सुनो! स्त्री-विमर्श पर रात-दिन मानमरदन करने वालों, कहां हो और क्यों बिलों में छिपे बैठे हो, सामने आओ और प्रगतिशील-मार्क्सवादी स्त्री-विमर्श के सहारे रुचिका-अरूषि को न्याय दिलवाओ। अब कहां है तुम्हारा स्त्री-विमर्श और स्त्री-विमर्श पर निकले मोटे-मोटे बेहूदा साहित्यिक अंक! सब कहने की बातें हैं स्त्री इस समाज और पुरुष के लिए क्या है बताने की आवश्यकता नहीं।
अब रुचिका को न्याय मिले या न मिले। उसके साथ जो होना था वो हुआ। पर, एक बात मैं फिर जोर देकर कहना चाहती हूं कि स्त्री की हैसियत आज भी इस आधुनिक और पढ़े-लिखे समाज में बहुत ही चिंताजनक है। जिसकी कीमत कभी रुचिका तो कभी अरूषि को चुकानी पड़ती है।
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मैं खुद को धर्म और ईश्वर के पाखंड से हमेशा दूर रखती हूं। मेरा न किसी धर्म में विश्वास है न किसी ईश्वर में आस्था। अक्सर अपनी इस आदत को लेकर मुझको दूसरों के विरोध का खामियाज़ा भी भुगतना पड़ता है। मगर मुझको उस खामियाज़े की परवाह नहीं। दूसरे मुझसे कहते हैं कि तुम स्त्री होकर भी धर्म और ईश्वर को नहीं मानतीं जबकि धर्म और ईश्वर का सबसे ज्यादा 'सम्मान' स्त्री ही करती है।
मेरी धर्म और ईश्वर में कभी आस्था या विश्वास इसलिए भी नहीं रहा क्योंकि इसने स्त्री को सबसे अधिक पीड़ित-प्रताड़ित किया है। तमाम तरह के बंधन उस पर लगाए हैं। फिर भी न जाने क्यों उसका हमेशा इसमें अटूट विश्वास बना रहा। आप किसी भी धर्म में देख लीजिए या कोई भी धर्मग्रंथ पढ़ लीजिए वहां आपको स्त्री हमेशा दोयम दरजे पर ही नज़र आएगी। हर धर्म और धर्मग्रंथ स्त्री को तमाम तरह की हिदायते देते हुए ही मिलेगा। घर-बाहर, समाज-परिवार, व्यवहार-आचरण हर जगह स्त्री को यह करने और वो न करने की सलाह दी जाती रही है। पति शोषण करे, बेटा घर से बाहर कर दे या पिता मारे मगर स्त्री को हर उत्पीड़न पर चुप ही रहना है क्योंकि यहां उसे उसके खिलाफ जाने या बोलने पर धार्मिक प्रतिबंध जो है।
बाबजूद इसके स्त्रियां धर्म और ईश्वर के प्रति इस कदर प्रतिबद्ध नजर आती हैं मानो अगर यह सब न हो तो उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए। मैंने ऐसी बहुत ही कम स्त्रियां देखी हैं जिनके लिए धर्म या ईश्वर का कोई महत्व नहीं होता। धार्मिक कर्मकांड को बढ़ाबा देने में सबसे आगे पीढ़ी-लिखी महिलाएं ही रहती हैं। सांस लेने से लेकर शादी-ब्याह तक को वे उन्हीं धार्मिक कर्मकांडों के दायरे में रहकर करना चाहती हैं, जहां उनकी अपनी कोई पहचान नहीं है। पन्नों पर लिखने के लिए वे पढ़ी-लिखी भी हैं और प्रगतिशील भी मगर सोच, विचार और आचरण में पूरी तरह सनातनी हैं। दरअसल, इसमें दोष उनका भी नहीं क्योंकि उनके परिवार उनकी मांओ ने उन्हें हमेशा धर्म में विश्वास और ईश्वर की अराधना करना ही सिखलाया है। लड़की की पहली शिक्षिका उसकी मां होती है। वो ही उसे सही और गलत के मायने सिखाती-बताती है। साथ ही, उसे धर्म और ईश्वर में विश्वास करने की ऐसी शिक्षा भी देती है जहां से वो कभी बाहरर नहीं आ पाती। अगर अपने ही बारे में कहूं तो मां ने मुझे भी धर्म में विश्वास और ईश्वर में आस्था रखने के प्रति हर बार प्रेरित किया मगर मुझे यह सब बोझ और बकबास ही लगता रहा। मैंने इस विषय में कभी उनकी बात न मानी न ही सुनी। अक्सर मां से अपने अविश्वास और उनके विश्वास को लेकर वैचारिक व शाब्दिक टकराहटें हो जाया करती थीं पर अंततः उन्हें हार कर कहना ही पड़ता था कि जो तेरे मन में आए वही कर। हां, मैं वही करती थी आज भी वही करती हूं जो मेरा मन, दिमाग और सोच में होता है। आखिर मैं उस पत्थर का सहारा क्यों और किसलिए लूं जिसे वास्तविकता में न मैंने कभी देखा न जिसका अस्तित्व है? भगवान या ईश्वर हमारी अंध-कल्पना का एक खौफनाक रूप है। आखिर उस बेअस्तित्व के प्रति मैं कैसे नतमस्तक हो सकती हूं जिसके लिए हर बार यही कहा जाता है कि 'उससे डरो'। ईश्वर, डर और भय की निशानी नहीं तो और क्या है। कम से कम मैं उस डर को अपनी वैचारिक, सामाजिक, परिवारिक और व्यक्तिगत आजादी में बाधा नहीं बनाना चाहती।
सिर पर कलश रखे अक्सर जब मैं उन आस्थावान महिलाओं को देखती हूं तो लगता है कि हम समय और परिवर्तन से अभी
कितना पीछे हैं। उनके सिर पर पहले ही इतना बोझ हैं फिर इस बोझ को लेकर पता नहीं वे क्या हासिल करना चाहती हैं? सदियां बीत गईं स्त्री को यह सब करते लेकिन इससे उसको मिला क्या, यह सोचने-समझने का विषय है। और तो और मैं देखती हूं उन लड़कियों को जो या तो परिक्षा देने जा रही होती हैं या जिनका परिणाम आने वाला होता है इस वास्ते पहले वे ईश्वर की शरण में जरूर जाती हैं अपनी 'सफलता की मनोकामना' के लिए। बेहतर हो प्रार्थना कर वे ईश्वर को ही न बुला लिया करें। जो-जैसा तुमने किया है वही तुम्हारे सामने आएगा इसमें ईश्वर की स्तुति या भूमिका का क्या मतलब।
मेरी इन बातों का आप यह अर्थ मत निकालिएगा कि मैं स्त्री में हो रहे जरूरी बदलावों को नहीं देख पा रही हूं। उस सब को मैं देख-समझ रही हूं। बाबजूद इसके उनका धर्म और ईश्वर के प्रति गहरा लगाव और झुकाव मुझको अक्सर परेशान कर देता है। जब वे हर जगह खुद को बदलने की कोशिश कर रही हैं फिर यहां क्यों नहीं? आखिर यहां क्या समस्या, क्या मजबूरी है? वे अगर खुद को इन तमाम धार्मिक दकियानूसी आस्थाओं, परंपराओं, विश्वासों, सामंती आचरण से बाहर निकाल लें तो इसे उनका एक महत्वपूर्ण क्रांतिकार कदम कहा-माना जाएगा। बहुत सारी वर्जनाएं टूटेगीं उनके इस कदम से। पर प्रश्न तो यही है कि क्या ऐसा कभी संभव हो पाएगा?
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आखिर ऐसा क्यों है कि जो दर्जा पत्नी अपने पति को देती है पति नहीं देता? क्यों हर बार, हर पूजा, हर संस्कार और हर विश्वास पर केवल पत्नी को ही खरा उतरना होता है पति को नहीं? क्यों पत्नियां ही पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं पति नहीं? क्यों दहेज और अत्याचार की लाठी पत्नी ही खाती है पति नहीं? समाज में पत्नियों को ही बेचारी समझा जाता है पतियों को क्यों नहीं? क्यों नहीं पति एक दिन का निर्जल व्रत पत्नियों के लिए नहीं रखते?
अब कुछ समझदार-जानकार कहेंगे कि पति देवता होता है, इसलिए। पति को यह अधिकार है। पति का दर्जा पत्नी कभी ले ली नहीं सकती। पति पति ही होता है। औरत कभी भी पुरुष के बराबर खड़ी नहीं हो सकती। जी हां तर्क यही होंगे। या जो लोग तर्क पर यकीन नहीं करते; साफ कह देंगे कि हम जुबान लड़ाती या खोलती लड़की, पत्नी या औरत को 'कहीं का नहीं छोड़ते'। 'कहीं का नहीं छोड़ते' का मतलब आप समझते हैं न!
खैर...। मान लेती हूं कि जमाना बहुत तेजी से बदल रहा है। आधुनिकता की खुमारी का नशा आंगन से बिस्तर तक पहुंच गया है। जकड़ने टूटी हैं। टूट रही हैं। पर करवाचौथ पर पति की लंबी उम्र का ख्याल रखने और व्रत रहने वाली पत्नी से क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि क्या तुम्हारे पति भी तुम्हारी लंबी उम्र की कामना करते हैं? व्रत रहते हैं? पहला कोरा पत्नी के हाथ से ही खाते हैं? उनका उत्तर क्या होगा? यकीनन यही कि पति परमेश्वर है। पति अदालत है। आदि-इत्यादि।
अच्छा जो पत्नियां हर रोज पति की मार-कुटाई का शिकार बनती हैं या फिर जो उनके लिए सिर्फ 'इच्छा-पूर्ति' ही हैं, उनके लिए भी करवाचौथ पर पति देवता हो जाते हैं। बेशक इसे आप भारतीय संस्कार या परंपरा मानकर चुप रह लें, मगर मैं इसे सामंती संस्कारों का वहशी रूप मानती हूं। संस्कारों-परंपराओं की आड़ में अगर पत्नी मर या मार भी दी जाती है, तो यह भी सही है, क्योंकि यह पति की मर्जी है। दरअसल, हमारे यहां हर औरत की पराजय पुरुष की मर्जी के कारण ही होती है। जो इस पराजय से लोहा लेना चाहती हैं, वो समाज के लिए चरित्रवान पत्नियां नहीं होतीं। उन्हें पत्नी बनने का हक ही नहीं दिया जाना चाहिए।
करवाचौथ अब फैशन का बाजार है। जो पत्नी करवाचौथ पर ब्यूटी-पार्लर नहीं जाती। फैशन नहीं करती। अपने चेहरे को रंगती-पोतती नहीं। वो पतिव्रता या आधुनिक पत्नी हो ही नहीं सकती। बाजार ने उसे यह समझा-बता दिया है कि अगर अपने पति की लंबी-उम्र की कामना करना चाहती हो तो ब्यूटी-पार्लर जरूर जाओ। भले ही तुम्हारा सजना-संवरना रात ढलते-ढलते सुस्त पड़ता जाए पर पति के समक्ष सजी-संवरी गुड़िया ही बनी रहो। हां, यह आधुनिक करवाचौथ की हकीकत है।
मुझे नहीं मालूम कितने पति करवाचौथ की हकीकत और पत्नी के व्रत के संस्कार को समझते होंगे। शायद उनके लिए यह दिन भी रोजमर्रा के दिनों जैसा ही होगा। यह हमारे समाज की पुरुष-सत्ता है। जो अपनी मर्जी की मालिक है।
बाजार ने करवाचौथ को ब्यूटी पार्लर का संस्कार देकर और भी सामंती बना दिया है। क्या आपको नहीं लगता कि यह अपनी पति की लंबी उम्र की दुआ नहीं, अपनी 'ओढ़ी हुई सुंदरता' का दिखावा मात्र है। मगर जो बाजार की गिरफ्त में है, वो इसे क्या और क्यों समझेंगे?
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आज दो अक्टूबर है। गांधी जयंती। गांधी के बहाने गांधी को याद करने का 'एक दिन'।
आज दो अक्टूबर है। लालबहादुर जयंती। लालबहादुर के बहाने लालबहादुर को न याद करने का 'हर दिन'।
हमें हर बार और हर कहीं सिर्फ गांधी ही याद रहते हैं। गांधी की बातें। गांधी का चरखा। गांधी के आदर्श। गांधी का गांधीवाद। गांधी हम पर सुरूर की तरह छाए हुए हैं। गांधी पर फिल्में बनती हैं। गांधी की आड़ में गांधीगीरी चलाई जाती है। हर सरकारी दफ्तर में गांधी की तस्वीर के नीचे गांधी की जबरदस्त धज्जियां उड़ाई जाती हैं। गजब देखिए। गांधी की कही बातों को अपनाने के लिए तो कहा जाता है। परंतु यहां कोई गांधी नहीं होना चाहता। जो तथाकथित गांधीवादी हैं, वे भी गांधी की सादगी में नहीं अपनी 'ओढ़ी हुई सादगी' में मस्त रहते हैं। न उनके हाथों में गांधी-डंड़ा होता है। न सिर पर गांधी-टोपी। न आंखों पर गांधी-चश्मा। न तन पर गांधी-वस्त्र। न व्यवहार में गांधी-चरखा। न शब्दों में गांधी-विचार।
मालूम है आपको गांधी होना या बनना किसी भी तरह के स्त्री-विमर्श से ज्यादा कठिन है।
हमें शुरू से यह बताया गया है कि यह गांधी (बापू) का देश है। यहां हर कोई गांधी बनने की तमन्ना रखता है। खासकर हमारे नेता खुद को गांधी से कम नहीं समझते! गांधी उनकी बपौती हैं। अब यह मेरी आंखों का मोतियाबिंद है या दिमागी लचारी कि मुझे यहां गांधी कहीं नजर नहीं आते। मैं तो गांधी को गांधी पार्क तक में जाकर खोज आई। पर गांधी नहीं मिले। सिवाय गंदी और धूलभरी प्रतिमा के। क्या गजब है कि हमने अपने महापुरूषों को प्रतिमाओं तक ही महदूद रख छोड़ा है। बेशक हमारे पास गांधी हैं, लेकिन प्रतिमाओं या तस्वीरों में। सिर्फ दो अक्टूबर के लिए। आयोजनों और जुबान-खर्ची के लिए।
दरअसल, हम महापुरूषों को अपनी सुविधाओं के हिसाब से याद करते हैं। हमें गांधी में तमाम सुविधाएं नजर आती हैं, मगर लालबहादुर में नहीं। लालबहादुर की सादगी का हमारे लिए कोई मतलब नहीं। आजकल नेताओं के बीच सादगी का जो दौर चल रहा है वो ज्यादा खास है। यहां हर खास की कीमत होती है। गांधी से हमें तमाम सुविधाएं मिलती रहती हैं, जो लालबहादुर से नहीं मिल पातीं। कमाल है कि यहां हर कोई गांधी तो बनना चाहता है, परंतु लालबहादुर नहीं। स्कूलों में भी बच्चों को गांधी का रट्टा लगवाया जाता है, लालबहादुर को कौन पूछता है? क्या लालबहादुर बनने के खतरे हैं? हां शायद उनकी ईमानदारी और सादगी के कारण!
गांधी की लाठी ताकतवर थी। लालबहादुर की ईमानदारी सशक्त। आज 21वीं सदी में दोनों ही हाशिए पर हैं। लाठी हथियार बन गई है। ईमानदारी बेईमानी। देश में नेता जरूर हैं, पर अपनी-अपनी सुविधाओं के लिए। हम तरक्की कर रहे हैं, पर गांव और खेतों को खत्म कर। किसान की आत्महत्या अब हमें परेशान नहीं करती। हां, मंत्री का सर दर्द तुरंत खबर बन जाता है।
यह गांधी, लालबहादुर और भगत सिंह का देश है। आज उनका आजाद कराया हुआ भारत देश अपनी आजादी पर रो रहा है। हमारी आजादी को लालफीताशाही की दीमक लगातार खोखला कर रही है। नहीं हमने नहीं बचाकर रखा है अपने महान क्रांतिकारियों और महापुरूषों के बलिदानों को। बस तरक्की की भेड़चाल में हर कोई यहां-वहां लगा हुआ है।
खैर...। गांधी हमने तुम्हारा ख्याल बस इतना रखा है कि तुम्हें नोटों पर सजा दिया है। और लालबहादुर हम तुम्हारा ध्यान इसलिए नहीं रख सके क्योंकि हमें गांधी की याद से फुर्सत ही नहीं मिली। हां अगर आज किसी को याद या ध्यान रहा तो तुम्हें (लालबहादुर) भी याद कर लिया जाएगा। वैसे इस देश में सब ठीक है। नेता मजे में है। भ्रष्टाचारी अर्थ-भक्ति में व्यस्त हैं। सुरक्षा-व्यवस्था चाक-चौबंद है।
तो गांधी और लालबहादुर अब तुम लोग आराम करो, हम अभी तुम्हारे गलों को सजाने आते हैं।
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हंस का नबंवर अंक स्त्री-विमर्श पर केंद्रित होगा। यानी एक और स्त्री-विमर्श। हंस में स्त्री-विमर्श पर वही प्रगतिशील लिखेंगे, जो बरसों से स्त्री-विमर्श की आड़ में उसकी गोलाईयों और गहराईयों का नाप-जोख ले रहे हैं। जिन्होंने स्त्री को शरीर से आगे बढ़कर न जाना है न पहचाना। इन सब महान स्त्री-विमर्श क्रांतिकारियों की फौज हंस के पन्नों पर स्त्री को बिखरते हुए देखेगी।
हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श पर बात बेहद ठसक के साथ की जाती है। विचारों को इस तरह से रखा जाता है कि अभी कुछ पलों में ही भारतीय स्त्री की दिशा और दशा बदलने वाली है। खुद राजेंद्र यादव ने अपने लेखों में स्त्री-विमर्श के बहाने स्त्री को आपकी कलम की नोक से कई दफा और कई जगह छूआ है। उन्हें कपड़ों में बंद नहीं, खासकर, ऊपर और नीचे से खुली स्त्री ही चाहिए; प्रगतिशील स्त्री-विमर्श के लिए। प्रगतिशीलों की निगाह में स्त्री सिर्फ दो ही जगहों से खूबसूरत हो सकती है। स्त्री हमारे मार्क्सवादी प्रगतिशीलों के लिए हर वक्त चूसे जाने वाला रस है।
कमाल देखिए, यह स्त्री-विमर्श कभी काली-कलूटी और कुरूप स्त्री पर नहीं किया जाता। स्त्री-विमर्श के लिए हमेशा सुंदर और कसावट वाली स्त्री ही चाहिए। गर्म स्त्री चाहिए।
अक्सर मैं सोचती हूं, जब अपने यहां स्त्री-विमर्श के इतने हितैषी और कद्रदान हैं, बावजूद इसके स्त्रियों की पारिवारिक और सामाजिक स्थिति में सुधार क्यों नहीं आ पा रहा? स्त्री को आज भी मारा और जलाया जा रहा है। क्या मरने और जलने वाली स्त्री अगर शरीर ढकना छोड़ दे, तो उसकी दिशा और दशा में बदलाव संभव है? प्रगतिशीलों कृपया उत्तर दें।
हंस के पिछले स्त्री-विमर्श पर लार टपकाते अंक मैंने देखे-पढ़े हैं; पर वहां निम्न वर्ग की स्त्री तो है ही नहीं। पढ़े-लिखे प्रगतिशीलों ने तमाम विदेशों लेखों के कथनों को अपने लेखों में भरकर यह जताने का प्रयास किया है कि देखो तुम से कहीं ज्यादा इस मुद्दे पर तो हमने पढ़ रखा है! भारत की गरीब और गांवों में बसने वाली स्त्रियों के पास उन जैसा उन्मुक्त स्त्री-विमर्श है ही नहीं।
यह कहने या लिखने में मुझे कोई अफसोस नहीं कि हंस-टाइप्ड स्त्री-विमर्श स्त्रियों को निरंतर धोखा दे रहा है। हम बाजार और विज्ञापनों के तो तुरंत खिलाफ हो जाते हैं, मगर ऐसे बेहूदा विमर्शों पर कभी कुछ नहीं कहते-बोलते। शायद साहित्य के सूरमाओं से डरते हैं!
मेरे लिए स्त्री का दूसरा नाम संघर्ष है। परंतु वो संघर्षशील स्त्री कभी भी स्त्री-विमर्श के बहस या अंक का माध्यम नहीं बन पाती। पुरुष बेमतलब के स्त्री-विमर्श तो कर-करवा सकता है, लेकिन स्त्रियों के संघर्ष में साथ आकर कभी खड़ा नहीं हो सकता। खुद राजेंद्र यादव बताएं कि वह कितनी दफा अपनी पत्नी के संघर्ष में साथ आकर खड़े हुए हैं? एक राजेंद्र यादव ही क्या; यहां ऐसे कितने मार्क्सवादी प्रगतिशील लेखक हैं, जिन्होंने स्त्री को कभी शरीर से आगे देखने-समझने की कोशिश की है।
अब तक स्त्री-विमर्श पर चलने वाली समस्त बहसें उसके ऊपर-नीचे के पते-ठिकानों से आगे नहीं बढ़ पाई हैं। पागल बनाते हैं वो जो स्त्री-विमर्श को स्त्री की प्रगतिशीलता से जोड़कर देखते हैं। जरा बताएं ये हंसवादी प्रगतिशील अब तक स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में क्या-क्या ठोस कर चुके हैं? कितनों ने अब तक स्त्री को सामाजिक और पारिवारिक गुंडागर्दी से बचाया है? यहां तो सब के सब पन्नों पर और भाषणों में क्रांति करते रहते हैं। स्त्री के वास्तविक दर्द ये वाकिफ ही नहीं।
यह स्त्री-विमर्श 'खोखला ढकोसला' है। हमें ऐसे स्त्री-विमर्श की कोई जरूरत नहीं, जो उसके त्याग और संघर्ष पर नहीं; उसकी गोलाईयों-गहराईयों पर केंद्रित हो।
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यह विद्रूप ही है कि संसद से सड़क तक महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण की मांग करने वाली हमारी तथाकथित राजनीतिक नेत्रियां कभी यह नहीं कहतीं कि सक्रिय राजनीति में भी महिलाओं का प्रतिशत बढ़ना चाहिए। उन्हें 33 फीसद आरक्षण की तो चिंता सताती है, परंतु सक्रिय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के प्रश्न पर वे मौन रहना ही पसंद करती हैं। शायद उनकी मौन पसंद में उनकी वास्तविक पसंद निहित हो! राजनीति में कौन चाहता है अपनी मलाई को दूसरे से शेयर करना।
आज राजनीति में जितनी भी महिलाएं सक्रिय हैं उनका अपना न कोई आधार है न अधिकार। उनके अधिकार और आधार पुरुष की स्वीकृति के गुलाम हैं। निज की स्वतंत्रता उन्हें कहीं नहीं है। वे सीना तानकर कहीं भी यह कह सकने की स्थिति में नहीं हैं कि हां यह मेरा अधिकार क्षेत्र है। मैं इसकी मालकिन हूं। मैं जानती हूं अब आप दो नाम अवश्य ही लेंगे; सोनिया गांधी और मायावती का। कुछ तो यह भी कह देंगे कि इन दोनों महिलाओं का अपना-अपना अधिकार क्षेत्र है। उसकी मालकिन भी ये ही हैं। अगर इस खुशफहमी को सत्य मान भी लिया जाए तो भी इसका कोई आधार नहीं होगा। सत्ता की जमीन पर सिर्फ दो ही महिलाओं के मजबूत पांव समस्त स्त्री-वर्ग की खुशहाली और मजबूती के लिए नाकाफी हैं। न ही इसे पूरी स्त्री-जाति की सबलता का वाइज ही ठहराया जा सकता है। उन्होंने अपने पांव तो मजबूत कर लिए मगर उन आम महिलाओं के विषय में कभी कुछ नहीं सोचा जो न सिर्फ सामाजिक बल्कि आर्थिक रूप से भी बेहद पिछड़ी हुई हैं। उनके पास अपनी कोई ताकत या जमीन नहीं है। महिलाएं ही महिलाओं की गुलाम हैं। सत्ता का मोह किसे अपने पाश में नहीं ले लेता!
साथ ही एक विद्रूप यह भी है कि चुनावों में महिलाओं का शोषण उनके प्रति हिंसा कभी कहीं कोई मुद्दा नहीं बनती। इसे मुद्दे को वे महिला सांसद तक उठाना पसंद नहीं करतीं जो स्वयं इस त्रासदी से अच्छे से बावस्ता हैं। उन्हें भी और मंत्रियों की तरह या तो मंदिर-मस्जिद बनवाने की जल्दी है या फिर काले धन को भारत वापस लाने की। जबकि मेरी निगाह में ये दोनों ही मुद्दे गैर-जरूरी और बोगस हैं। न मंदिर-मस्जिद महिलाओं के शोषण को रोक पाएंगे न काला धन स्त्री-धन की रक्षा कर पाएगा।
दरअसल, हमारी सरकारें पुरुषवादी सोच से ग्रस्त हैं। उन्हें नहीं लगता कि महिलाओं का भी स्तर बेहतर होना चाहिए और दैहिक-शोषण से उन्हें मुक्ति मिलनी चाहिए। यह हमारी कोरी खुशफहमी ही है कि हम कुछ प्रतिशत शहरी महिलाओं के शैक्षिक-सामाजिक स्तर को देखकर ही यह अनुमान लगा लेते हैं कि अन्य महिलाओं के भी शैक्षिक-सामाजिक स्तर में सुधार आ रहा है। वे जागरूक बन रही हैं। मगर यह कम से कम मेरी निगाह में पूरा सच तो नहीं है। गांव-कस्बों की महिलाएं तो आज भी अपने अस्तित्व से जूझ रही हैं। उनकी शिक्षा की तो छोड़िए उनका सामाजिक परिवेश भी गुलामों जैसा ही है। वे पुरुष वर्चस्व के हाथों हर रोज शोषित होने को मजबूर हैं। मगर अफसोस हमारी सरकारों नेताओं और महिला-नेत्रियों का ध्यान यहां कभी नहीं जाता। केवल तभी जाता है जब उन्हें उनके वोट चाहिए होते हैं। यानी सारी कवायदें महज वोट बटोरने तक ही सीमित हैं।
वो अखबार वो चैनल ही क्या जिसमें विज्ञापित होती स्त्री न दिखती या दिखाई जाती हो। अखबार का पेट और चैनल की टीआरपी स्त्री की विज्ञापित होती छवि के बिना नहीं भर सकते। यह उनके लिए जरूरी है। शायद खुराक है उनकी।
मौसम में तब्दीली से लेकर नए उत्पाद के बाजार में आने तक सभी में स्त्री को पेश किया जाता है। अखबार मौसम के बढ़ते पारे में सर और मुंह छिपाती लड़की की तस्वीरों को ही छापना पसंद करते हैं। सर्द मौसम में भी उनका यही हाल रहता है। ऐसा लगता है, मानो इस धरती पर सबसे ज्यादा गर्मी और सर्दी स्त्री को ही लगती है!
अब विज्ञापनों को दोष देने वाले तर्क देते हैं कि स्त्री सरे बाजार अपने शरीर को दिखा रही है। खुलेआम और खुलकर विज्ञापित हो रही है। स्त्री को शर्म नहीं आती। शायद सारी शर्म-ओ-हया का ठेका अकेली स्त्री ने ही ले रखा है यहां!
खैर, स्त्री तो बेशर्म हो ही गई है। मगर जो शर्मसार और शर्म के रखवाले हैं उनकी शर्म कहां है? जब वे स्वयं स्त्री का शोषण करते पकड़े जाते हैं, उसे सरेआम खुलकर छेड़ते हैं, तब वे शर्मसार नहीं होते? तब उनकी कथित शर्म कहां चली जाती है? चाहते हैं कि स्त्री हर चीज केवल उन्हीं की आंखों से देखे। यानी स्त्री उनकी आंखों की गुलाम हो-बनकर ही रहे। वाह! आंखों वालो वाह!
कितना बेशर्म ख्याल है कि विज्ञापित होती स्त्री अपनी संस्कृति-सभ्यता को नष्ट कर रही है। यानी हर गलत और बुरा सिर्फ स्त्री ही करती है। बाकी हमारा सारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है! जितना और जहां तक गरियाना हो जमकर स्त्री को ही गरियाओ क्योंकि वो न कुछ कहेगी न बोलेगी। हर किसी को हर वक्त हर उम्मीद बस स्त्री से ही है।
आप अंडरबियर पहनकर विज्ञापित हो सकते हैं, लेकिन स्त्री के सीने पर से अगर जरा-सा पल्ला भी सरक जाए तो यहां 'सांस्कृतिक कोहराम' मच जाता है। वैसे हमें सब पाठ समानता का पढ़ाते हैं, मगर बात जब स्त्री की समानता से आकर जुड़ती है, सब अपनी-अपनी बगलों की बदबूओं पर खुशबूदार डियो डालकर बास दूर करने का प्रयास करते हैं। क्या लाजवाब और लजीज अक्ल पाई है उन्होंने!
अगर कल को कोई स्त्री पूछने लगे कि क्या अधिकार है अखबारों को चलती-फिरती लड़कियों की तस्वीरों को छापने का? किसने दिया है उन्हें यह हक? तब 'नैतिक उत्तर' किसी के पास नहीं होगा, सिवाय इसके कि यह तो हमारा काम है। जनाब जब यह आपका काम है तो फिर अपनी मर्जी से विज्ञापित होती स्त्री को टोकने वाले आप होते कौन हैं? उसकी मर्जी वो चाहे कुछ भी पहने या कैसे भी विज्ञापित हो। बेहतर हो आप अपने पेट के दर्द को काबू में रखें।
जरा कभी कोई असरदार मुहिम चलाएं उन अखबारों और चेनलों के खिलाफ जो स्त्री को जबरन विज्ञापित करते रहते हैं।

