Wednesday, October 8, 2008

स्त्री को भोग्या बनाया तो तुम्हीं ने है

जिन्होंने स्त्री में भोग और भोग्या की छवि को ही देखा-समझा है, उनसे पहला प्रश्न तो मेरा यही है कि स्त्री को भोग्या बनाया किसने है? स्त्री अपनी मर्जी से तो भोग्या नहीं बनी। न ही कभी उसने यह कहा-जताया होगा कि लो आओ और मुझे भोगो। अगर इतनी बात या इच्छा स्त्री अपने मुंह से जाहिर कर दे, तो सदचरित्रों के सीनों पर सांप लोटने लगेंगे। इस बात का दावा है मेरा। तुरंत अपने मुंह पर हाथ रखकर यह कहेंगे, 'देखो कितनी बेशर्म है खुद अपने मुंह से कह रही है कि मेरे साथ संबंध बनाओ।' तुम्हें अपने मुंह और हाथ से स्त्री को सब कुछ कहना पसंद है, लेकिन जब स्त्री कहती हैं, तब तुम्हें मिर्ची लग जाती हैं। यह क्या बात हुई?
कुछ सदचरित्र स्त्री के पहनावे पर भी एतराज जता रहे हैं। उनका मत है कि स्त्रियां भड़काऊ कपड़े पहनती हैं। इसी कारण समाज में स्त्रियों के प्रति घटनाओं में इजाफा हो रहा है। अब मुंह खोलूंगी तो कहोगे कि मेरी भाषा गंदी है, मगर क्या करूं, मजबूर हूं। वाह! तुम घर-बाहर बनियान-अंडरबियर पहनकर घुमो और हमारा अगर सीने पर से पल्ला भी सरक जाए, तो तुम्हारी नानी मर जाती है। तुम्हें हम भड़काऊ दिखने लगती हैं। तस्लीमा नसरीन ने अपनी आत्मकथा में एक जगह बड़ा ही गजब का प्रश्न उठाया था कि 'जब मेरा भाई पूरे घर में सिर्फ बनियान पहनकर टहल सकता है, तो फिर मैं क्यों नहीं? सारी पाबंदियां मुझ पर ही क्यों?' दरअसल, सदचरित्रों को हर स्त्री नंगी और भोग्या ही नजर आती है। ये लोग अपने चरित्र और आचरण में इतना महान होते हैं कि ये अपने घर-परिवार की बहू-बेटियों को तो परदे में रखना पसंद करते हैं, मगर बाहर की हर औरत इन्हें नंगी और बेशर्म ही नजर आती है।
अरे क्यों हिचक रह हो, यह तुम ही होते हो जो हर फिल्म में हीरोइन को कम कपड़ों में ही देखने की तमन्ना रखते हो। तुम्हें तो हर लड़की फिल्म में बस कपड़े उतारती हुई ही नजर आनी चाहिए, उससे कम तुम कुछ स्वीकार नहीं। अब जब तमाम हीरोइनें खुलकर अपने कपड़े उतार रही हैं, तो तुम सफेदपोशों को उस सब में अश्लीलता नजर आ रही है। यह सब देखकर तुम्हारे घर-परिवार की बहू-बेटियां बिगड़ रही हैं। अरे, तुम्हारे घर-परिवार की बहू-बेटियां कितनी सियानी हैं, हम सब जानती हैं। ज्यादा मुंह न खुलवाओ।
क्या करूं, मुझे भी इन नामर्द सदचरित्रों के झूठे आरोपों का जवाब इन्हीं की जुबान में देने के लिए मुझे मजबूर होना पड़ता है। अगर ऐसे नहीं कहा-बोला जाए, तो ये हमारे सिर पर चढ़कर नाचने लगेंगे। मेरा तो यहां हर स्त्री से यह आह्वान है कि डरो मत इनसे इन्हें इन्हीं की भाषा में प्रतिउत्तर दो, सब अक्ल आ जाएगी। बस, ठान लो कि डरना मना है।

16 comments:

सब रवि जितना ही सत्य है भले कहो बिंदास
आप यूँ ही लिखती रहें यह हम सब की आस

अनुजा जी सच लिखा है आपने , डर असल अश्लीलता की परिभाषा ही दो हैं अपने को मज़े लेने अश्लीलता अच्छी है और जगत में अपने आप को सद्चरित्र दिखाने के लिए बुरी . हम स्वयं यह पसंद करते है देखना फ़िर ढोंग करते है और इसको गंदा और बेशर्मी का नाम देते है . आपके विचारों का सदैव स्वागत है
मेरी नई रचना "शेयर बाज़ार पढने हेतु आपको सादर अपने इष्ट मित्रों सहित आमंत्रण है कृपया मेरे ब्लॉग पर पधारें और जाते जाते अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त करें <> स्वागत है

October 8, 2008 8:59 PM  

आप ने कम शब्दों में सब कुछ कह दिया है। आप बहुत अच्छा और बेबाक लिख रही हैं। आप और अच्छा लिखें। शुभ कामना।

October 8, 2008 9:02 PM  

अनुजा बहुत बहुत थैंक्स . अगर तुम्हारी तरह ही हर लड़की बन सके तो कम से कम ब्लॉग पर से तो हम ये गंदगी हटा ही सकते हैं . मुझे लगता हैं की नारी ब्लॉग सफलता इसी मे हैं की उसकी आज जगरूप रूप से नारी पर उठाए गए मुद्दों की बात अपने अपने ब्लॉग पर की बात कह रही हैं . ब्लॉग को कम से कम सडको की तरह सार्वजनिक शौचालय {जहाँ जब पुरूष चाहे निर्वस्त्र हो सके और इसको अपना अधिकार समझे और नारी को कहे की तुम आँख बंद कर लो , तुम बुरका पहन लो ताकि हम मन मर्ज़ी से रहे } बनने से तो हम सब रोकने का प्रयास कर ही सकते हैं .

October 8, 2008 9:32 PM  

October 8, 2008 9:36 PM  

पता नहीं, आप कौन का राज खोलना चाहती है और किसे सबक सिखाना चाहती हैं. पता नहीं, आपके मन में कौन सा विद्रोह है, जिससे ये पूरी दुनिया जल कर भस्म हो जाएगी, जो भी हो निकाल लीजिए, कौन रोकता है आपको. पहले आप होगी, लोग थोड़ा रोकेंगे, फिर कोई और होगी, उसपर प्रतिरोध कम होगा, फिर कोई किसी को नहीं रोकेगा, भले ही सारे लोग वस्त्र उतारकर घूमें. ऊंची-ऊंची बात कर लेने से कोई प्रतिवादी नहीं हो जाता. आपके मन में जो आता है, वही करिए. हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है.

October 8, 2008 9:55 PM  

हम आपके साथ है। मर्दों के मन की इन परतों को उधेड़ दीजिए। आर अनुराधा का ब्लॉग पढ़ रहा था। उन्होंने भी खुल कर कैंसर की बीमारी के बहाने औरतों के शरीर के प्रति मर्दों के मन के भीतर बैठी तस्वीरों को सामने रख दिया है। आप लोग खुल कर लिखिये। मर्दवादी प्रतिक्रिया से घबराने की ज़रूरत नहीं। ये सोच खुद को समझदार कहने वाले मर्दों के भीतर भी है। इन सबको बाहर निकाल कर उन्हीं के सामने पटक

October 8, 2008 10:06 PM  

लेख का शीर्षक भले ही आकर्षक लगे मगर लेख से मेल नही खाता. स्त्री को भोग्या कहने का अर्थ है की उसे हर कोई किसी वस्तु की तरह प्रयोग कर सकता है. क्या हमारे समाज में स्त्री की (हमारी बहन बेटियों की) यही छवि है..
स्त्री और पुरूष का सम्बन्ध बराबर का है.. वह जो प्यार और स्नेह पुरूष को देती है उसके बदले में वही पाती भी है... हां यह अवश्य है की समय के साथ बदलाव हुआ है स्त्रियाँ अपने आप को पुरूष से कन्धा मिला कर चलने की बात करती हैं, खुलेपन की बात करती हैं परन्तु इस सब के जो परिणाम निकलते हैं उनसे सामना करने से कतराती हैं. समाज कही बाहर से नही आता .. नारी और पुरूष मिल कर जिस आने वाली पीढियों का निर्माण कर रहे हैं वही.. मान या अपमान का कारण हैं...कमी कहीं न कहीं हम में ही है की हम घर का वातावरण तो ठीक कर नही पाते और समाज को सुधारना चाहते हैं..
यह मेरी व्यक्तिगत राय है किसी व्यक्ति विशेष पर टीका टिपण्णी नही ..

October 9, 2008 1:01 AM  

ठीक कहा अनुजा। कल मेरी पोस्ट "ब्लॉग्गिंग से उपजी मर्दवादी निरंकुशता" और उधर रचना की पोस्ट"स्त्री को भोग्या बनाने वाले ब्लॉगर" पर आई भ्रमित करने वाली टिप्पणियों के बाद ऐसे बहानों का सही उत्तर देने वाली पोस्ट प्रतीक्षित ही थी।

October 9, 2008 1:38 AM  

परन्तु इस सब के जो परिणाम निकलते हैं उनसे सामना करने से कतराती हैं

हमेशा ये परिणाम बात स्त्री के लिये क्यों उठती हैं . क्यूँ समाज मे अपनी मर्ज़ी से रहने का हक़ स्त्री को नहीं हैं वही पुरूष जो चाहे करे . हम सब यहाँ खुले पण की पैरवी नहीं कर रहे हम सब यहाँ कह रहे हैं की पुरूष स्वछंद रहे इसके लिये स्त्री अपने को बचा कर सम्भाल कर रखे . एसा क्यूँ और कब तक ???

October 9, 2008 3:03 AM  

अगर कोई अपनी अति महत्‍वकाक्षाओं के लिए कपड़े उतारता है तो इसमें भी क्‍या पुरूषवादी सोच वजह है।

October 9, 2008 7:03 AM  

नो कमेंट्स !

October 9, 2008 8:24 AM  

सम्बंधित विषय पर मैं कोई राय नहीं रखता, पर आपका बेबाक और धारदार लेखन पसंद आया.

October 9, 2008 9:03 AM  

Inspite of the forcefull language, there is nothing worthwhile in the content. Learn to live in the present. World outside of the boundaries of discriminatory cast,creed & sex is far more superior and living worthy, if you have the sight and ability to be there.

October 9, 2008 11:55 AM  

नमस्कार सब कर रहे,पुरुष आपको आज.
जो चाहें करलें स्वयं,छोङ शरम और लाज.
छोङ शरम और लाज,होङ तस्लीमा से कर.
छपो छपाओ छा जाओ,निर्वस्त्रा होकर.
कह साधक कवि,अनुजा देवी चमत्कार है.
सारे पुरुष करें झुक-झुक कर नमस्कार है.

October 10, 2008 8:48 AM  

saraa dosh ujaalo kaa hai, andhkaar badnaam hai.

March 1, 2009 11:58 AM  

kya stri aur purush ki sharirik sanrachna mein fark nahin hai? stri kaise baniyaan pahan kar ghoom sakti hai? meri chhati par koi ek haath maar de to koi fark nahin padta,aapke saath aisa hai kya?

tasleema nasreen ke ek galat sawal ko aadhaar bana kar aapne poora lekh hi likh dala hai.

stri ko bhogya banaya gaya matlab kya? agar stri aisa na karna chahe to kya? aawaaz wahan uthaaiye jahan koi aisi baat karta hai aapse. magar nahin aapko to samaj mein rahna hai na.aap bas blog likhiye aur pata nahin kiske khilaaf itna gussa hai, uske khilaaf likhiye.
purush samaj ko hi samapt kar diya jaaye ya napunsak bana diya jaaye, mahilaaon ki sthiti sudhar jaayegi

September 14, 2009 11:22 AM  

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